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📚 भारतीय इतिहास

कांग्रेस सत्र: आधुनिक भारत

Congress Sessions: Modern India

12 मिनटintermediate· Indian History

कांग्रेस सत्र: आधुनिक भारत

परिचय

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सत्र भारत के स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्र निर्माण के महत्वपूर्ण क्षण हैं। 1885 में इसकी स्थापना के बाद से, कांग्रेस ने वार्षिक सत्र आयोजित किए जो राष्ट्रवादी विचारधारा, स्वतंत्रता रणनीति और संवैधानिक मामलों पर चर्चा के मंच बन गए। इन सत्रों ने भारतीय राजनीतिक विचार के विकास को मध्यम दृष्टिकोण से कट्टरपंथी राष्ट्रवाद तक प्रदर्शित किया। कांग्रेस सत्र, विशेषकर 19वीं सदी के अंत से स्वतंत्रता तक, भारतीय नेतृत्व के परिवर्तन और भारतीय संविधान के निर्माण को दर्शाते हैं। RPSC RAS परीक्षार्थियों के लिए इन सत्रों को समझना महत्वपूर्ण है क्योंकि वे आधुनिक भारतीय इतिहास की नींव हैं।

मुख्य अवधारणाएं

1. उदारवादी चरण सत्र (1885-1905)

ए.ओ. ह्यूम, दादाभाई नौरोजी और सुरेंद्रनाथ बनर्जी जैसे नेताओं के अंतर्गत शुरुआती कांग्रेस सत्र संवैधानिक सुधार और ब्रिटिश सरकार को याचिकाओं पर केंद्रित थे। इन सत्रों ने क्रमिक राजनीतिक सुधार, परिषदों में प्रतिनिधित्व और कानूनी साधनों के माध्यम से भारतीय हितों की सुरक्षा की वकालत की।

2. चरमपंथी चरण सत्र (1905-1920)

बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल के नेतृत्व में सत्रों ने आक्रामक राष्ट्रवाद और स्वदेशी सिद्धांतों का परिचय दिया। 1905 के कलकत्ता सत्र ने बंगाल के विभाजन को चिह्नित किया, जिससे कट्टरपंथी गतिविधियां बढ़ीं। इन सत्रों ने जनता की भागीदारी, ब्रिटिश सामानों का बहिष्कार और स्वराज (आत्मशासन) की अवधारणा को बढ़ावा दिया।

3. गांधी युग के सत्र (1920-1942)

महात्मा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस सत्र अहिंसात्मक प्रतिरोध के मंच में रूपांतरित हुए। 1920 के नागपुर सत्र ने स्वराज को लक्ष्य के रूप में अपनाया, और बाद के सत्रों ने सविनय अवज्ञा, नमक सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन को बढ़ावा दिया।

4. संवैधानिक सत्र (1946-1950)

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के सत्र भारतीय संविधान का मसौदा तैयार करने और शासन के लिए तैयारी पर केंद्रित हुए। 1946 के सत्र ने संविधान सभा के गठन को अधिकृत किया। इस अवधि के सत्रों ने देशी रियासतों के एकीकरण, अल्पसंख्यक अधिकार और नई भारतीय गणराज्य की रूपरेखा को संबोधित किया।

5. स्वतंत्रता के बाद के सत्र (1950 onwards)

स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस सत्र राष्ट्र निर्माण, आर्थिक नीतियों और लोकतांत्रिक समेकन पर केंद्रित हुए। इन सत्रों ने भारत के धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और समाजवादी शासन दृष्टिकोण को आकार दिया।

महत्वपूर्ण तथ्य

  • भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 1885 में हुई और इसका पहला सत्र ए.ओ. ह्यूम की अध्यक्षता में बंबई में आयोजित हुआ।
  • 1905 के कलकत्ता सत्र में उदारवादियों और चरमपंथियों के बीच विभाजन हुआ, जिससे दो अलग-अलग विचारधारा वाले समूह बने।
  • 1906 के कलकत्ता सत्र में "स्वराज" शब्द को औपचारिक रूप से कांग्रेस के प्राथमिक उद्देश्य के रूप में पेश किया गया।
  • 1920 के नागपुर सत्र ने एक महत्वपूर्ण मोड़ को चिह्नित किया, संपूर्ण स्वतंत्रता को लक्ष्य और गांधीवादी अहिंसा को विधि के रूप में अपनाया।
  • 1931 के कराची सत्र ने मौलिक अधिकार और राष्ट्रीय आर्थिक नीति को निर्धारित किया, जो संविधान के लिए एक खाका था।
  • 1942 के बंबई सत्र ने "भारत छोड़ो" प्रस्ताव पारित किया, भारत से ब्रिटिश वापसी की मांग की।
  • 1946 के दिल्ली सत्र ने भारतीय संविधान के निर्माण के लिए एक संविधान सभा की स्थापना का संकल्प लिया।
  • 1947-1950 के बीच कांग्रेस सत्र देशी रियासतों के एकीकरण और संवैधानिक प्रावधानों के मसौदे पर केंद्रित थे।
  • स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस सत्र की नियमित बहसें भूमि सुधार, औद्योगिक विकास और सामाजिक कल्याण पर नीतियों को प्रभावित करती रहीं।
  • ये सत्र औपनिवेशिक प्रजा से संप्रभु नागरिकों में बदलाव को दस्तावेज करते हैं, भारत की लोकतांत्रिक यात्रा को प्रतिबिंबित करते हैं।

परीक्षा के टिप्स

  • प्रमुख सत्रों पर ध्यान दें: 1885 (प्रथम), 1905 (कलकत्ता), 1906 (स्वराज), 1920 (नागपुर), 1931 (कराची), 1942 (भारत छोड़ो), 1946 (स्वतंत्रता), और 1950 (संविधान)।
  • महत्वपूर्ण सत्रों के प्रमुख अध्यक्षों और स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान को याद रखें।
  • कांग्रेस सत्रों को प्रमुख आंदोलनों से जोड़ें: स्वदेशी (1905), असहयोग (1920), सविनय अवज्ञा (1930), भारत छोड़ो (1942)।
  • कांग्रेस सत्रों के भीतर उदारवादी से चरमपंथी से गांधीवादी दृष्टिकोण तक दार्शनिक विकास को समझें।
  • कराची सत्र (1931) के संकल्पों को अध्ययन करें, क्योंकि इन्होंने संविधान को प्रभावित किया।
  • संवैधानिक विकास के लिए तैयार रहें और कांग्रेस ने भारत की शासन संरचना को कैसे आकार दिया।
  • मुख्य सत्रों में पारित विशिष्ट प्रस्तावों को याद रखें, विशेषकर स्वतंत्रता और संविधान से संबंधित।
  • कांग्रेस सत्रों को व्यापक ऐतिहासिक घटनाओं और स्वतंत्रता आंदोलन पर उनके प्रभाव से जोड़ें।

सारांश

कांग्रेस सत्र आधुनिक भारत की राजनीतिक चेतना और संवैधानिक ढांचे को आकार देने में महत्वपूर्ण थे। शुरुआती सत्रों के उदारवादी दृष्टिकोण से लेकर बाद के सत्रों की क्रांतिकारी जोश तक, इन बैठकों ने स्वतंत्रता आंदोलन का विकास किया। नागपुर सत्र ने अहिंसा को प्राथमिक हथियार के रूप में स्थापित किया, जबकि कराची सत्र ने संवैधानिक दिशानिर्देश प्रदान किए। स्वतंत्रता के बाद के सत्र संविधान के मसौदे तैयार करने और लोकतांत्रिक शासन की स्थापना में महत्वपूर्ण साबित हुए। कांग्रेस सत्रों को समझना यह बोझ करने में मदद करता है कि कैसे भारत औपनिवेशिक शासन से एक संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य में संक्रमित हुआ।

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