परिचय एवं परीक्षा प्रासंगिकता
पर्यावरण अर्थशास्त्र (Environmental Economics) आधुनिक भारतीय अर्थव्यवस्था का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंग बन गया है। RPSC RAS परीक्षा में सामान्य अध्ययन के अंतर्गत भारतीय अर्थव्यवस्था और पर्यावरण संरक्षण से संबंधित प्रश्न नियमित रूप से पूछे जाते हैं। पर्यावरण अर्थशास्त्र वह विज्ञान है जो आर्थिक गतिविधियों और पर्यावरणीय संसाधनों के बीच संबंध का अध्ययन करता है। यह विषय भारत की सतत विकास नीति और पर्यावरण संरक्षण के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण नियंत्रण, पुनर्नवीकरणीय ऊर्जा और संसाधनों के सतत प्रबंधन जैसे विषय RPSC की परीक्षा में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इसलिए इस अध्याय का गहन अध्ययन आवश्यक है।
मुख्य अवधारणाएं
1. पर्यावरणीय क्षरण और आर्थिक लागत
पर्यावरणीय क्षरण से तात्पर्य प्राकृतिक संसाधनों की गुणवत्ता में कमी से है। यह जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण, मिट्टी की बर्बादी और जैव विविधता में कमी के रूप में प्रकट होता है। आर्थिक दृष्टिकोण से, पर्यावरणीय क्षरण से अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान होता है। भारत की GDP का लगभग 2-3 प्रतिशत पर्यावरणीय क्षरण के कारण खोया जाता है। कृषि, मत्स्य पालन, पर्यटन और स्वास्थ्य सेवा जैसे प्रमुख क्षेत्र पर्यावरणीय गिरावट से सीधे प्रभावित होते हैं।
2. बाहृ प्रभाव (Externalities) और सार्वजनिक सामग्रियां
बाहृ प्रभाव वह परिस्थिति है जिसमें किसी आर्थिक गतिविधि का प्रभाव उस गतिविधि में सीधे संलग्न पक्षों के अलावा अन्य लोगों पर भी पड़ता है। उदाहरण के लिए, एक कारखाने का प्रदूषण उसके कर्मचारियों और व्यवसायियों को प्रभावित न करके आसपास के क्षेत्र के निवासियों के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाता है। पर्यावरण एक सार्वजनिक सामग्री है जिसका उपभोग कोई भी कर सकता है। बाजार तंत्र स्वयं पर्यावरणीय क्षरण की समस्या को हल नहीं कर सकता, इसलिए सरकारी हस्तक्षेप आवश्यक है।
3. संसाधन मूल्य निर्धारण और आंतरिकीकरण
पर्यावरणीय संसाधनों को बाजार में उचित मूल्य न देने से उनका अत्यधिक दोहन होता है। उदाहरण के लिए, जल संसाधन को सस्ता मानने से उसका अपव्यय होता है। पर्यावरणीय लागत का आंतरिकीकरण करना अर्थात् उत्पादन की प्रक्रिया में पर्यावरणीय क्षति की लागत को शामिल करना आवश्यक है। कार्बन कर, प्रदूषण कर और जल उपयोग कर जैसे उपकरण इसी उद्देश्य को पूरा करते हैं। राजस्थान में भी जल और खनिज संसाधनों के सतत प्रबंधन के लिए ऐसी नीतियां लागू की जा रही हैं।
4. जलवायु परिवर्तन और कार्बन अर्थशास्त्र
जलवायु परिवर्तन विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक चुनौतियों में से एक है। भारत जलवायु परिवर्तन के प्रति सबसे संवेदनशील देशों में से एक है। कृषि पर इसका प्रभाव सर्वाधिक गंभीर है क्योंकि भारत की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर है। कार्बन अर्थशास्त्र में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को नियंत्रित करने के आर्थिक उपायों का अध्ययन किया जाता है। भारत सरकार ने 2070 तक कार्बन तटस्थता प्राप्त करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। पुनर्नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश और ऊर्जा दक्षता इसके मुख्य साधन हैं।
5. हरित अर्थव्यवस्था और सतत विकास
हरित अर्थव्यवस्था वह आर्थिक विकास है जो पर्यावरणीय संसाधनों को संरक्षित करते हुए प्राप्त किया जाता है। संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य (SDGs) हरित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देते हैं। राजस्थान में नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन, कृषि के आधुनिकीकरण और पर्यटन के संरक्षणीय विकास जैसी परियोजनाएं हरित अर्थव्यवस्था के उदाहरण हैं। भारत का राष्ट्रीय कार्य योजना भी सतत विकास के लक्ष्यों के साथ संरेखित है।
महत्वपूर्ण तथ्य
भारत की पर्यावरणीय स्थिति: भारत विश्व के 17 सबसे जैव विविधता समृद्ध देशों में से एक है। भारत के वन क्षेत्र में लगभग 8% विश्व की जैव विविधता पाई जाती है। हालांकि, भारत में प्रतिवर्ष लगभग 0.5 मिलियन हेक्टेयर वन क्षेत्र में कमी हो रही है।
जल संकट: भारत में लगभग 400 मिलियन लोग गंभीर जल की कमी का सामना कर रहे हैं। भूजल के अत्यधिक दोहन से कई क्षेत्रों में जल स्तर में भारी गिरावट आई है। राजस्थान इस समस्या से सबसे अधिक प्रभावित है।
प्रदूषण और स्वास्थ्य: वायु प्रदूषण से भारत में प्रतिवर्ष लगभग 12 लाख मृत्यु होती हैं। स्वास्थ्य सेवाओं पर प्रदूषण-संबंधित खर्च GDP का 3% है।
कृषि और जलवायु: भारत में कृषि अभी भी मानसून पर 70% निर्भर है। जलवायु परिवर्तन से फसलों की पैदावार में 10-40% तक की गिरावट हो सकती है।
राजस्थान विशेष
राजस्थान की पर्यावरणीय चुनौतियां: राजस्थान भारत का सबसे बड़ा रेगिस्तानी क्षेत्र है जहां जल की कमी सबसे गंभीर समस्या है। राजस्थान की वार्षिक वर्षा मात्र 50 सेमी है। भूजल स्तर में तीव्र गिरावट आ रही है। खनन गतिविधियों के कारण पर्यावरणीय क्षरण एक प्रमुख समस्या है।
सरकार की पहलें: राजस्थान सरकार ने "राजस्थान जल संरक्षण नीति" को लागू किया है। इंदिरा गांधी नहर परियोजना से रेगिस्तान में हरियाली लाई गई है। सूर्य ऊर्जा के क्षेत्र में राजस्थान अग्रणी भूमिका निभा रहा है। राजस्थान का सोलर एनर्जी सेक्टर देश में दूसरे स्थान पर है।
जैव विविधता: राजस्थान की वनस्पति और जीव-जंतु विविध हैं। राणा प्रताप सागर, माउंट आबू और रणथंभौर जैसे क्षेत्र जैव विविधता के संरक्षण में महत्वपूर्ण हैं।
परीक्षा पैटर्न
RPSC RAS परीक्षा में पर्यावरण अर्थशास्त्र से निम्नलिखित प्रकार के प्रश्न पूछे जाते हैं:
बहुविकल्पीय प्रश्न: पर्यावरणीय संसाधनों के मूल्य निर्धारण, जलवायु परिवर्तन की आर्थिक लागत, भारत की पर्यावरणीय नीतियों और राजस्थान-विशिष्ट समस्याओं पर प्रश्न पूछे जाते हैं।
विस्तृत उत्तर वाले प्रश्न: पर्यावरणीय क्षरण और आर्थिक विकास के बीच संबंध, सतत विकास के उपायों और भारत की जलवायु नीति पर विस्तृत विश्लेषण की मांग की जाती है।
केस स्टडी: राजस्थान के विशिष्ट उदाहरणों जैसे जल संकट, खनन प्रभाव और नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं पर प्रश्न पूछे जाते हैं।
स्मरण युक्तियां
संक्षिप्त नाम याद रखें: GHG (ग्रीनहाउस गैस), SDGs (सतत विकास लक्ष्य), GDP (सकल घरेलू उत्पाद), NDC (राष्ट्रीय निर्धारित योगदान)।
आंकड़ों को याद रखने की रणनीति: 2070 - भारत के कार्बन तटस्थता का लक्ष्य, 17 - विश्व में जैव विविधता समृद्ध देशों की संख्या, 50 सेमी - राजस्थान की वार्षिक वर्षा।
अवधारणाओं को जोड़ना: बाहृ प्रभाव → संसाधन मूल्य निर्धारण → आंतरिकीकरण → सतत विकास - इस क्रम को समझें।
तुलनात्मक विश्लेषण: राजस्थान की समस्याओं को अन्य राज्यों के साथ तुलना करके याद रखें जैसे जल संकट - राजस्थान, महाराष्ट्र; प्रदूषण - दिल्ली, महाराष्ट्र।
मानचित्र अध्ययन: राजस्थान के जल क्षेत्र, खनन क्षेत्र, सोलर प्रोजेक्ट और वन क्षेत्रों को मानचित्र पर चिह्नित करें।
समसामयिक जानकारी: हाल की पर्यावरणीय नीतियों, जलवायु सम्मेलनों के निर्णय और भारत की COP29 प्रतिबद्धताओं को अपडेट रखें।